Monday, 16 January 2017

बातों -बातों में

    कुछ दिन पहले मैं छोटे बेटे के साथ मायके ( स्थानीय ) चली तो रास्ते में एक स्कूटी खड़ी थी। जाहिर है कार तो रुकनी ही थी। बेटे के हॉर्न बजाने पर एक लड़की निकली। अच्छी भली लड़की थी। आज के ज़माने के हिसाब से ही सजी हुयी थी। कुछ भी ऐसा नहीं था की बुरा लगे। मुझे तो वैसे भी बेटियां प्यारी ही लगती है। लेकिन बेटे का जो एक्शन था वह मुझे अच्छा नहीं लगा। उसने उसे देखते ही गले से हो -हो ( धीरे से ही ) करके हिकारत भरी ध्वनि निकाली।
      मैंने कहा, " क्या हुआ ?
     " उसको देखा आपने ?
     " अच्छी  भली तो है ? "
   " अच्छी कहाँ थी , कितनी चित्रकारी कर रखी मुहँ पर ! "
" तो क्या हुआ ? यह उसकी अपनी रूचि है। उसको ऐसे तैयार होना अच्छा लगता होगा। हम कौन होते हैं उसे ऐसे जज करने वाले ! और जरा सोचो, यहाँ अगर उसकी जगह तुम्हारी कोई बहन होती या अगर मैं ही होती तो क्या तुम ऐसे ही ' हो-हो ' करते ? "
   वह कार रोक कर  बोला, " मेरी मां ऐसे तैयार होती ही नहीं और अगर होगी तो मैं होने नहीं दूंगा ! "
  उसने वाक्य तो लाड़ से शुरू किया था पर खत्म एक अधिकार की तरह किया। जब तक मायके पहुंची उसे मैंने समझाया कि किसी भी लड़की के बारे में बात करने से पहले अपनी बहन को सामने रख कर सोचना। उसने  मेरे इन उपदेशात्मक बातों से शर्मिंदा  होते / चिढ़ते  कार की स्पीड बढ़ा कर मुझे डरा दिया। लेकिन उसके इस रवैये ने मुझे सोचने पर मुझे सोचने पर मज़बूर कर दिया कि उसकी यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी क्या ?
       जो भी हो मुझे लगता है कि जैसे हम बेटियों को बात-बात पर  टोकते हैं , सिखाते हैं कि  अगले घर जाना है। एक बहू और पत्नी बनना है , वैसे ही लड़कों को हमें सिखाना / टोकना ही चाहिए। जिस से उसमें नारी के प्रति सम्मान बने और एक स्वस्थ समाज का निर्माण हो।