Saturday, 7 January 2017

प्रेम की डोर

         हम सब एक दूसरे से कैसे बंधे होते हैं ? कौन है जो मन से मन की पुकार को सुना देता है ? ऐसा क्या होता है कि कोई किसी को याद करे और दूसरा भी उसकी याद में तड़फ उठता है।
       अक्सर जब भी मैं माँ को फोन करने को फोन उठाती तो तभी  माँ का फोन आ जाता। मैं भी  हंस कर कहती कि अभी आपसे बात करने के लिए फोन उठाया ही था कि आपका फोन आ गया। यह तो माँ और बेटी के प्रेम की डोर है जो गर्भनाल से सिंचित है। प्रेम जो भौतिक नहीं हो , दैहिक नहीं हो वही प्रेम अलौकिक है।
       प्रेम है तो बस है। यह कभी एक तरफ़ा भी तो नहीं होता,  प्रेम कभी बंधन में कब बंधा है। छोड़ दीजिये उसे बंधन मुक्त करके !अगर सच में प्रेम है या उसका अस्तित्व है तो वह जरूर मन की पुकार सुनेगा। अन्यथा सायों के पीछे भागना व्यर्थ है।
        मंदिर में बजती घण्टियाँ मुझे खींचती है। और मैं अपने ईष्ट के प्रेम की डोर से बंधी चल पड़ती हूँ। मन में प्रेम की भावना ही हमें ईश्वर से जोड़ती है। राह चलते हुए अगर चींटी पर पैर पड़ते हुए अगर आपका कदम रुक जाता है तो यह प्रेम है। ईश्वर की मूर्ति के लिए फूल तोड़ने के हाथ बढ़ें हो और रुक जाये , मन में एक हूक सी उठे कि नहीं, फूल तो डाली पर ही सुन्दर लगता है , तो यह प्रेम है। प्रेम दुनिया की सबसे सुन्दर और कोमल अहसास है।
   
ॐ शांति।